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अयोध्या मसला: पैनल को दिया और 15 अगस्त तक का समय


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Ajmer:नई दिल्ली। अयोध्या राम जन्मभूमि मामले की जल्द सुनवाई की मांग करने वाली याचिका पर पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए मध्यस्थता पैनल से रिपोर्ट मांगी है।  मामले में मध्यस्थता पैनल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सील बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। पैनल ने मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी करने के लिए शुक्रवार को शीर्ष अदालत से और समय दिए जाने की मांग की जिसे अदालत ने स्‍वीकार करते हुए पैनल को दिया और 15 अगस्त तक का समय दे दिया है। हिंदू पक्षकार गोपाल सिंह विशारद की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने विशारद की अर्जी पर विचार किया। पीठ ने इस दौरान कहा कि हमने मामले में मध्यस्थता के लिए पैनल बनाई है और इसकी 11 बैठकें हो चुकी हैं। हम पहले जान लें कि इसमें क्या प्रगति हुई है। अपनी अर्जी में विशारद ने कहा था कि मध्यस्थता में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है इसलिए कोर्ट मुख्य मामले पर जल्द सुनवाई करे। कोर्ट ने मामले पर विचार करने का आश्वासन दिया था। मालूम हो कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2010 में विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। जिसमें एक हिस्सा भगवान रामलला विराजमान और दूसरा निर्मोही अखाड़ा व तीसरा हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को दिया था। इस फैसले को भगवान राम सहित हिंदू-मुस्लिम सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कोर्ट के आदेश से फिलहाल यथास्थिति कायम है। इस बीच आठ मार्च को शीर्ष कोर्ट ने अयोध्या विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी। सर्वमान्य हल तलाशने के लिए समिति को 15 अगस्त तक का समय दिया गया है। पिता राजेंद्र सिंह ने दाखिल किया था पहला मुकदमा विशारद अयोध्या विवाद में मुख्य याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं। इनके पिता राजेंद्र सिंह ने 1950 में पहला मुकदमा दाखिल किया था जिसमें बिना रोक टोक रामलला की पूजा का हक मांगा गया था। साथ ही जन्मस्थान पर रखी रामलला की मूर्तियों को वहां से हटाने पर स्थाई रोक मांगी थी। फैजाबाद जिला अदालत से होता हुआ यह मुकदमा इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने अन्य याचिकाओं के साथ इसपर फैसला दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2010 में अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद में फैसला देते हुए विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। कोर्ट ने जमीन को रामलला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बांटने का आदेश दिया था। साथ ही साफ किया था कि रामलला विराजमान को वही हिस्सा दिया जाएगा जहां वह विराजमान हैं। हाई कोर्ट के इस फैसले को सभी पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से फिलहाल यथास्थिति कायम है। Newsview.in - Hindi News.