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मानव, बंदर नहीं ऋषियों के वंशज: सत्यपाल सिंह


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नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और बागपत से मौजूदा बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर डार्विन के सिद्धांत को नकारा. उन्होंने कहा कि ‘इंसानों की विकास यात्रा बंदरों से शुरू नहीं हुई है, हम ऋषियों की संतान हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा में मानव अधिकार पर जोर नहीं था, संस्कार पर जोर था.’ शुक्रवार को लोकसभा में मानवाधिकार संरक्षण संशोधन बिल पास हो गया. इस संशोधन के बाद राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार संस्थाओं के चेयरमैन का कार्यकाल पांच साल से घटाकर तीन साल कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस के अलावा चीफ जस्टिस भी आयोग के अध्यक्ष बन सकेंगे. राज्यों में हाईकोर्ट के पूर्व जज को यह मौका मिलेगा. इसी बहस में हिस्सा लेते हुए सत्यपाल सिंह ने कहा, ‘हम ऋषियों की संतान हैं. जो लोग कहते हैं कि हम बंदरों की संतान हैं उनकी भावना को ठेस पहुंचाना नहीं चाहता. हम ऋषियों की संतान हैं. मैं केवल कहना चाहता हूं कि हमारी संस्कृति परंपरा में मानव मनुष्य निर्माण पर ज़ोर दिया गया है, मानव अधिकारों पर नहीं. संस्कारों के बल पर एक मनुष्य के निर्माण पर ज़ोर दिया गया है.’ उनकी टिप्पणी ने विपक्ष ने तीखे पलटवार किए.उत्तर प्रदेश के बागपत से बीजेपी सांसद ने पहले भी डार्विन के सिद्धांत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह ‘वैज्ञानिक रूप से गलत है.’ जब वह मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री थे, तो उन्होंने कहा था कि वह खुद को बंदरों का वंशज नहीं मानते हैं. सिंह ने डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाने वाले स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम को बदलने की आवश्यकता पर भी जोर दिया था.  DMK सांसद कनिमोझी ने कहा-  सिंह के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, DMK सांसद कनिमोझी ने कहा, ‘दुर्भाग्य से, मेरे पूर्वज ऋषि नहीं हैं. मेरे पूर्वज होमो सेपियंस हैं, जैसा कि विज्ञान कहता है, और मेरे माता-पिता शूद्र हैं.’ उन्होंने कहा कि ‘वे किसी भगवान, या किसी भगवान के अंश से भी पैदा नहीं हुए थे. वे बाहर पैदा हुए थे और मैं यहाँ हूँ और मेरे राज्य के कई लोग सामाजिक न्याय आंदोलन और मानवाधिकारों के कारण यहाँ हैं जो हमने आज तक लड़े और हमने वह ऐसा करना जारी रखेगी.’ सिंह के तर्क का विरोध करते हुए, टीएमसी सांसद सुगाता रॉय ने कहा कि टिप्पणी संविधान का विरोध है. रॉय ने कहा ‘संविधान का अनुच्छेद 51 (ए), उप-धारा (एच) कहता है कि यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद और जांच और सुधार की भावना विकसित करे. सत्यपाल जी ने जो कहा है, वह यह है कि हम बंदरों से विकसित नहीं हुए हैं. वह डार्विन के विकास के सिद्धांत को नकार रहे हैं.’   ()